जीवन में असली या पूर्ण सुख नाम की कोई चिडिया है ही नहीं | हर इन्सान उमर के किसी दौर में सुखी, तो किसी दौर में दुखी रहता है | अंतर सिर्फ इतना है की कोई ज्यादा समय तक सुखी रहता है , कोई कम समय तक |सुखी या दुखी रहने के इस दौर की सीमा को बड़ाने या घटाने में काफी हद तक हमारी सोच का हेर फेर काम करता है |
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