यात्रा शुरू हो चुकी है हम सब आत्माए अपनी बारी के इंतज़ार में लम्बी लाइन में लगी है किश्ती का इंजिन स्टार्ट है सागर बहुत गहरा और लम्बा है किश्ती चक्कर लगा रही है इधर से आत्माए उधर के लिए ले जा रही हैं उधर से आत्माए इधर ला रही है सफ़र बहुत लम्बा है उस तरफ कई लोक है स्वर्ग लोक, गोउ लोक , वेखुंट लोक आदि लाइन में लगी कई आत्माए साथ ले जाने के लिए नाम धन इख्ठा कर रही है कई अज्ञान आत्मायो को मालूम नहीं है कि सफ़र में कितने नाम धन की आवशकता होगी वह वहां अपनी तरह की आत्मायो से सम्बन्ध बना रही है, वार्तालाप कर रही है, अठखेलियाँ कर रही है नंबर आने वाला है किश्ती में सवार होते ही सभी आत्माए स्वार्थी हो जाती है वे अपने किसी सगे सम्बन्धी को नही जानती अपना नाम धन अपने पास ही रखती है सफ़र में जैसे जैसे नाम धन की कमाई ख़तम हो जाती है दूसरी आत्माए उस आत्मा को किश्ती से सागर में धक्का दे देती है कोई किसी को आगे जाने के लिए अपना नाम धन नही देता दुखी और अशांत आत्मा की किश्ती में कोई और जगह नही है सागर को वही आत्माए पार कर पाती है जिनके पास नाम धन की पूरी मात्रा है सागर में डूबने वाली आत्माए गहरे समुन्दर में तरह तरह के कष्ट झेलती है कई भयंकर तरह के प्राणी उसे डराते है वह आत्मा पश्चाताप करती है, रोती है, और फिर प्रभु से प्राथना करती है कि हे प्रभु एक मौका और दो अब हम अपने लक्ष्य को नहीं भुलेगे और सागर को पार करने के लिए जितना भी नाम धन चाहिए उससे अधिक हम कमाएंगे सागर की लहरों के तपेड़े खाते हुए धरती पर लौट आती है और लाइन में लग जाती है भवसागर को पार करने के लक्ष्य को लेकर फिर संसार के चक्करों में फसकर भूल जाती है नाम धन की कमाई और रह जाती है शारीर की गुलाम होकर
ज़रा सोचिये हम किस श्रेणी में आते है ??? आत्ममंथन कीजिए !!! और सच का सामना करिएँ !!! क्या हम तेयार हैं भवसागर की यात्रा के लिए ???